गाजीपुर में सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, जनता के बीच खड़े रहने का है
गाजीपुर की राजनीति में आज एक बड़ा सवाल धीरे-धीरे आकार ले रहा है—क्या स्थानीय भाजपा नेताओं का ध्यान आम जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से ज्यादा आने वाले विधानसभा चुनाव की रणनीति पर है?
सड़क, रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, किसानों की समस्याएं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे जनता के लिए रोज की जरूरत हैं। लेकिन जब इन्हीं सवालों को लेकर आम नागरिक नेताओं के दरवाजे तक पहुंचता है और उसे अपेक्षित राजनीतिक आवाज नहीं मिलती, तो उसके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उसके प्रतिनिधि किसके लिए राजनीति कर रहे हैं?
मोदी और योगी के नाम पर चुनाव जीतने की उम्मीद करना अलग बात है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जनता के बीच अपनी मौजूदगी और जवाबदेही बनाए रखना अलग बात है। किसी भी पार्टी के लिए बड़े नेताओं का चेहरा चुनाव में मदद कर सकता है, लेकिन स्थानीय जनता के सवालों से लगातार दूरी संगठन के लिए चुनौती बन सकती है।
गाजीपुर का मतदाता अब केवल नारों और बड़े राजनीतिक भाषणों से संतुष्ट होगा, यह मान लेना शायद जोखिम भरा होगा। वह यह भी देखता है कि उसके मोहल्ले, गांव, बाजार और कस्बे की समस्या को कौन उठाता है और कौन सिर्फ चुनाव के समय दिखाई देता है।
लोकतंत्र में जनता किसी नेता की स्थायी संपत्ति नहीं होती। हर चुनाव में मतदाता अपने अनुभव, स्थानीय समस्याओं और सरकार तथा जनप्रतिनिधियों के काम को देखकर फैसला करता है।
इसलिए स्थानीय भाजपा नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मोदी-योगी के नाम पर कितनी सीटें जीती जा सकती हैं?” बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि “गाजीपुर की जनता के बीच पार्टी और उसके स्थानीय नेता कितने भरोसेमंद दिखाई दे रहे हैं?”
अगर जनता की आवाज को समय रहते नहीं सुना गया, स्थानीय समस्याओं को मजबूती से नहीं उठाया गया और कार्यकर्ताओं तथा आम नागरिकों के बीच संवाद कमजोर होता गया, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका राजनीतिक असर पड़ सकता है।
गाजीपुर की जनता किसी के खिलाफ नहीं, अपने हक में आवाज चाहती है।
और राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है—
जनता को केवल चुनाव के समय याद करने वाला नेता, जनता के बीच अपना भरोसा लंबे समय तक कायम नहीं रख सकता।
Politicianmirror के लिए Editor in chief Devendra Singh की कलम से

