Politicianmirror.com के लिए प्रयागराज से अनीश कुमार सिंह का सम्पादकीय लेख

आधुनिक दौर में शिक्षा का व्यवसायीकरण और गुरु-शिष्य परम्परा का अंत
परिचय
भारतीय संस्कृति में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और संस्कारों का माध्यम रही है। गुरु-शिष्य परम्परा इसका आधार थी, जिसमें गुरु केवल अध्यापक नहीं बल्कि मार्गदर्शक और जीवन निर्माता माने जाते थे। लेकिन आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा के व्यवसायीकरण ने इस परम्परा की आत्मा को लगभग खत्म कर दिया है।
गुरु-शिष्य परम्परा का महत्व
गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा निःशुल्क और समाज सेवा पर आधारित थी। शिष्य आश्रम में रहकर गुरु से विद्या, नीति, धर्म और जीवन मूल्य सीखता था। उस समय शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण और चरित्र निर्माण था, न कि केवल नौकरी या पैसों की प्राप्ति।
शिक्षा का व्यवसायीकरण: एक गंभीर चुनौती
वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप बदल चुका है। निजी स्कूल, कोचिंग संस्थान और महंगे विश्वविद्यालयों ने शिक्षा को व्यापार का रूप दे दिया है। अब फीस, रैंकिंग, पैकेज और डिग्री ही सफलता का पैमाना बन गए हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा का मानवीय और नैतिक पक्ष खोता जा रहा है।
व्यवसायीकरण के दुष्परिणाम
- शिक्षक और छात्र का संबंध “सेवा प्रदाता और ग्राहक” जैसा हो गया है।
- शिक्षा में संस्कार और नैतिकता की कमी साफ दिखने लगी है।
- विद्यार्थी रोजगार की दौड़ में मानवीय मूल्यों से कटते जा रहे हैं।
- गुरु का सम्मान और शिष्य का समर्पण भाव लगभग समाप्त हो गया है।
समाधान की दिशा
- शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा और मूल्य आधारित पाठ्यक्रम को शामिल किया जाए।
- शिक्षकों को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज निर्माण का कार्य समझना चाहिए।
- विद्यार्थियों में गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना जगाई जानी चाहिए।
- शिक्षा को “व्यवसाय” नहीं बल्कि “सेवा” के रूप में देखने की मानसिकता विकसित करनी होगी।
निष्कर्ष
यदि शिक्षा केवल नौकरी और पैसों तक सीमित रह गई तो भारतीय शिक्षा प्रणाली अपनी आत्मा खो देगी। आज आवश्यकता है कि हम गुरु-शिष्य परम्परा की भावना को फिर से जीवित करें और शिक्षा को केवल व्यवसाय नहीं बल्कि समाज निर्माण और संस्कार निर्माण का साधन बनाएं। यही मार्ग भारत को उसकी प्राचीन शैक्षिक गौरव की ओर वापस ले जाएगा।

